किसी काल खंड में स्त्री प्रधान व्यवस्था का प्रादुर्भाव भी जानने में आता है. प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को एक दूसरे का पूरक बनाया है. किसी एक की प्रधानता की ललक स्वस्थ व्यवस्था के लिए उचित नहीं प्रतीत होती. स्वतंत्रता, उच्छ्रंखलता, स्वच्छंदता आदि को परिभाषित करना अत्यंत संवेदनशील विषय है. सामाजिक जीवन की समक्यता को ही इसका मापदंड मानना उचित होगा ऐसा मेरा मत है. स्त्री पुरुष सम्बन्ध की अनेक विलक्षणताएं हैं जिन पर प्रकाश न डालते हुए नकारात्मक पक्ष को अतिरंजित करने का प्रचलन क्रांतिकारी तो प्रतीत होता है परन्तु पुरुष के व्यवहार में सुधार के उद्धेश्य की कितनी पूर्ति उससे होती है, कहना कठिन है. इस सम्बन्ध में मुझे राम - रावण - मंदोदरी - सीता का दृष्टांत स्मरण हो रहा है जिसके परिप्रेक्ष्य में प्रत्येक को प्रयास करना चाहिए कि राम पर रावण को प्रबल न होने दे.