Saturday, October 6, 2012

सत्य

धर्म को रेल के सिग्नल की तरह समझा जा सकता है। रेल का सिग्नल जिस प्रकार रेलों के कुशल सञ्चालन के लिए आवश्यक होता है,उसी प्रकार धर्म मानव जीवन के सम्यक निर्वाह तथा सार्थकता के लिए अनिवार्य है।
सत्य धर्म का  सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्वरुप है। इसे व्यापक अर्थ में समझाना होगा। सत्य का अर्थ हम सामान्यतः सत्य बोलना ही लगा लेते हैं। वस्तुतः अग्नि के संपर्क में आने पर जलना सत्य का पालन ही है।
इस सम्बन्ध में राष्ट्रिय संत श्री मोरारी बापू का एक दृष्टान्त यहाँ उद्धृत करना उचित होगा। एक व्यक्ति ने विचार किया कई प्रकार के पाक का रसास्वादन कर लिया, अब चन्द्र - पाक बनाते हैं। चन्द्र पाक बनाने के उद्धेश्य से पात्र में घी डाल कर अग्नि पर इस प्रकार रख दिया की पूर्णिमा के चन्द्र की छवि उसमें दिखाई देती रहे। सोचिये, कितना भी समय पकाते रहें तो भी क्या इस प्रकार चन्द्र पाक बन पायेगा? इसी प्रकार सत्य के आश्रय के बिना मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध   नहीं हो सकती।

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