Sunday, March 3, 2013

अहिंसा

अहिंसा परमो धर्मः.
अहिंसा को परम धर्म माना गया है.
हिंदू शास्त्रों में अहिंसा का सूक्ष्म रूप से सुन्दर विश्लेषण किया गया है. यदि किसी के पास पहनने को वस्त्र नहीं हैं तो उसके समक्ष सुन्दर वस्त्रों का प्रदर्शन भी हिंसा है. किसी के पास भोजन नहीं है तो उसके समक्ष रुचिकर भोजन करना भी हिंसा है. कोई अच्छा वक्ता नहीं है तो उसके सामने अपनी वक्तृता का प्रदर्शन करना भी हिंसा है.
इस सम्बन्ध में पुराणों में एक दृष्टांत है. शास्त्रार्थ में एक युवा विद्वान अन्य प्रकांड विद्वान से पराजित हो गए. इस ग्लानी के वशीभूत युवा विद्वान ने जीवन समाप्त करने का निर्णय ले लिया. विजेता विद्वान तक यह समाचार पहुंचा. इस पर युवा विद्वान को बुलवाया गया. विजेता विद्वान ने कहा " मैं विजेता हूँ अतः आपको मेरी आज्ञा का पालन करना होगा". पराजित विद्वान के स्वीकृती देने पर विजेता विद्वान ने कहा "मेरा आदेश है कि आप अपना जीवन समाप्त करने का निर्णय त्याग दें". पराजित विद्वान ने आज्ञा का पालन करते हुए जीवन समाप्त करने का विचार त्याग दिया. इसके तत्काल पश्चात विजेता विद्वान ने अपनी जिव्हा में छिद्र करवाके उसमें काष्ठ का टुकड़ा दाल दिया. जिस जिव्हा के उच्चारण से किसी के जीवन पर बन आए ऐसी जिव्हा का मौन रहना ही श्रेयष्कर है.केवल इश्वर भजन के समय काष्ठ निकाल लेते और पुनः जिव्हा में डाल लेते. उनका नाम ही काष्ठ जिव्हा पाणी पड़ गया.

गृहस्थ

हमारे  शास्त्रों में चार आश्रमों में से गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है.
गृहस्थ एक संस्था है जो हमें मर्यादित रूप से मानव जाति के विकास की ओर ले जाती है.
मानव जाति के उत्तरोत्तर विस्तार के लिए आवश्यक है नित्य नवीन अभ्युदय. परन्तु अभ्युदय का मूल्य है उत्सर्ग. तत्सम्बन्धी सभी क्रीड़ाएँ अंततः हमें उत्सर्ग की ओर ही ले जाती हैं.
अभ्युदय  - विकास - उत्सर्ग - अभ्युदय, यही चक्र है. प्रकृति ने विभिन्न क्रीड़ाओं में आनंद का समावेश इसीलिए किया है कि मानव जाति का अस्तित्व बचा रहे. प्रकृति की इस व्यवस्था के बिना उत्सर्ग की ओर अग्रसर होना संभव ही नहीं होता.
उत्सर्ग से बचा नहीं जा सकता. हाँ, उसकी अवधि में विस्तार अवश्य किया जा सकता है. कुछ मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध उत्सर्ग की अवधि में विस्तार के वशीभूत ग्राहस्थ्य को ग्रहण नहीं करते.
इससे अभ्युदय का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है.