Sunday, March 3, 2013

गृहस्थ

हमारे  शास्त्रों में चार आश्रमों में से गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है.
गृहस्थ एक संस्था है जो हमें मर्यादित रूप से मानव जाति के विकास की ओर ले जाती है.
मानव जाति के उत्तरोत्तर विस्तार के लिए आवश्यक है नित्य नवीन अभ्युदय. परन्तु अभ्युदय का मूल्य है उत्सर्ग. तत्सम्बन्धी सभी क्रीड़ाएँ अंततः हमें उत्सर्ग की ओर ही ले जाती हैं.
अभ्युदय  - विकास - उत्सर्ग - अभ्युदय, यही चक्र है. प्रकृति ने विभिन्न क्रीड़ाओं में आनंद का समावेश इसीलिए किया है कि मानव जाति का अस्तित्व बचा रहे. प्रकृति की इस व्यवस्था के बिना उत्सर्ग की ओर अग्रसर होना संभव ही नहीं होता.
उत्सर्ग से बचा नहीं जा सकता. हाँ, उसकी अवधि में विस्तार अवश्य किया जा सकता है. कुछ मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध उत्सर्ग की अवधि में विस्तार के वशीभूत ग्राहस्थ्य को ग्रहण नहीं करते.
इससे अभ्युदय का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है.

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