Monday, December 12, 2016

वर्ण व्यवस्था

मेरे अल्प ज्ञान के अनुसार सर्वोदय का सिद्धांत बाईबल के प्रसंग "अन्टू द लास्ट" का विस्तार है. प्रसंग के अनुसार कार्य स्थल पर दिवस के विभिन्न काल खण्डों में पहुँच कर काम में लगने वाले सभी श्रमिकों को समान दर से भुगतान किया जाना बताया गया है. इसके पीछे मूल अवधारणा प्राकृतिक न्याय के अधिक निकट है - क्षमता (अवसर भी) के अनुसार काम और आवश्यकता के अनुसार उपभोग. नवजात कुछ समय तक न्यूनतम कार्य करते हुए भी संसाधनों का अपेक्षाकृत अधिक उपभोग करता है. अन्यार्थ में वह एक काल खंड में परजीवी बन कर जीता है. उसी काल खंड में अत्यधिक परिश्रम करते हुए भी वरिष्ठ जन अल्प (रूखा सूखा) उपभोग से ही बिना किसी मतभेद संतुष्ट रहते हैं. यह नियम सभी जीवों में देखा जा सकता है.
अर्थ यह है कि संरक्षण त्याज्य नहीं है परन्तु उसका स्वरुप ऐसा होना चाहिए जो समाज में समरसता को बढाने वाला हो न कि वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करने वाला. जातिगत आधार पर प्रचलित वर्तमान आरक्षण व्यवस्था इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती. प्रचलित जाति प्रथा को समूल समाप्त करते हुए अधिक नैसर्गिक व्यवस्था का आविष्कार करना ही अभीष्ट है...
मानव जाति में एक प्राथमिक वर्गीकरण लिंग के आधार पर है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता. इसके अतिरिक्त सर्वहारा वर्ग (जो अपने पसीने से सींच कर मिट्टी को, उगाता है अन्न बहुजन का पेट भरने को और तोड़ कर पत्थर करता है मार्ग प्रशस्त) को मुख्या धारा में लाने के लिए, कृषि को लाभदायक उद्योग बनाए रखने के लिए, पर्यावरण की रक्षार्थ जो कुछ भी किया जाने योग्य हो किया जाए... उन प्रयासों में सारे देश वासी बिना लिंग, धर्म अथवा जाति में वर्गीकृत हुए जुट जाएं यही समय की मांग है अन्यथा आने वाली सन्ततियां हमें कभी क्षमा नहीं कर पाएंगी...

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