मनुष्यत्व
मेरा उद्धेश्य मनुष्य के द्वारा मनुष्यत्व हेतु आवश्यक गुणों के विकास पर चर्चा करना है।
Sunday, September 22, 2019
MVI 2124UniBike
12.11.2016
वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
चौकी घाट पर विदेशी द्वारा एक पहिये की साईकिल का अद्भुत प्रदर्शन
(Varanasi, Uttar Pradesh, India
awesome performance on single wheeled bicycle by a foreigner)
Saturday, September 9, 2017
स्त्री - पुरुष सम्बन्ध
किसी काल खंड में स्त्री प्रधान व्यवस्था का प्रादुर्भाव भी जानने में आता है. प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को एक दूसरे का पूरक बनाया है. किसी एक की प्रधानता की ललक स्वस्थ व्यवस्था के लिए उचित नहीं प्रतीत होती. स्वतंत्रता, उच्छ्रंखलता, स्वच्छंदता आदि को परिभाषित करना अत्यंत संवेदनशील विषय है. सामाजिक जीवन की समक्यता को ही इसका मापदंड मानना उचित होगा ऐसा मेरा मत है. स्त्री पुरुष सम्बन्ध की अनेक विलक्षणताएं हैं जिन पर प्रकाश न डालते हुए नकारात्मक पक्ष को अतिरंजित करने का प्रचलन क्रांतिकारी तो प्रतीत होता है परन्तु पुरुष के व्यवहार में सुधार के उद्धेश्य की कितनी पूर्ति उससे होती है, कहना कठिन है. इस सम्बन्ध में मुझे राम - रावण - मंदोदरी - सीता का दृष्टांत स्मरण हो रहा है जिसके परिप्रेक्ष्य में प्रत्येक को प्रयास करना चाहिए कि राम पर रावण को प्रबल न होने दे.
Monday, December 12, 2016
वर्ण व्यवस्था
मेरे अल्प ज्ञान के अनुसार सर्वोदय का सिद्धांत बाईबल के प्रसंग "अन्टू द
लास्ट" का विस्तार है. प्रसंग के अनुसार कार्य स्थल पर दिवस के विभिन्न काल
खण्डों में पहुँच कर काम में लगने वाले
सभी श्रमिकों को समान दर से भुगतान किया जाना बताया गया है. इसके पीछे मूल
अवधारणा प्राकृतिक न्याय के अधिक निकट है - क्षमता (अवसर भी) के अनुसार काम
और आवश्यकता के अनुसार उपभोग. नवजात कुछ समय तक न्यूनतम कार्य करते हुए भी
संसाधनों का अपेक्षाकृत अधिक उपभोग करता है. अन्यार्थ में वह एक काल खंड
में परजीवी बन कर जीता है. उसी काल खंड में अत्यधिक परिश्रम करते हुए भी
वरिष्ठ जन अल्प (रूखा सूखा) उपभोग से ही बिना किसी मतभेद संतुष्ट रहते हैं.
यह नियम सभी जीवों में देखा जा सकता है.
अर्थ यह है कि संरक्षण त्याज्य नहीं है परन्तु उसका स्वरुप ऐसा होना चाहिए जो समाज में समरसता को बढाने वाला हो न कि वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करने वाला. जातिगत आधार पर प्रचलित वर्तमान आरक्षण व्यवस्था इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती. प्रचलित जाति प्रथा को समूल समाप्त करते हुए अधिक नैसर्गिक व्यवस्था का आविष्कार करना ही अभीष्ट है...
मानव जाति में एक प्राथमिक वर्गीकरण लिंग के आधार पर है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता. इसके अतिरिक्त सर्वहारा वर्ग (जो अपने पसीने से सींच कर मिट्टी को, उगाता है अन्न बहुजन का पेट भरने को और तोड़ कर पत्थर करता है मार्ग प्रशस्त) को मुख्या धारा में लाने के लिए, कृषि को लाभदायक उद्योग बनाए रखने के लिए, पर्यावरण की रक्षार्थ जो कुछ भी किया जाने योग्य हो किया जाए... उन प्रयासों में सारे देश वासी बिना लिंग, धर्म अथवा जाति में वर्गीकृत हुए जुट जाएं यही समय की मांग है अन्यथा आने वाली सन्ततियां हमें कभी क्षमा नहीं कर पाएंगी...
अर्थ यह है कि संरक्षण त्याज्य नहीं है परन्तु उसका स्वरुप ऐसा होना चाहिए जो समाज में समरसता को बढाने वाला हो न कि वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करने वाला. जातिगत आधार पर प्रचलित वर्तमान आरक्षण व्यवस्था इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती. प्रचलित जाति प्रथा को समूल समाप्त करते हुए अधिक नैसर्गिक व्यवस्था का आविष्कार करना ही अभीष्ट है...
मानव जाति में एक प्राथमिक वर्गीकरण लिंग के आधार पर है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता. इसके अतिरिक्त सर्वहारा वर्ग (जो अपने पसीने से सींच कर मिट्टी को, उगाता है अन्न बहुजन का पेट भरने को और तोड़ कर पत्थर करता है मार्ग प्रशस्त) को मुख्या धारा में लाने के लिए, कृषि को लाभदायक उद्योग बनाए रखने के लिए, पर्यावरण की रक्षार्थ जो कुछ भी किया जाने योग्य हो किया जाए... उन प्रयासों में सारे देश वासी बिना लिंग, धर्म अथवा जाति में वर्गीकृत हुए जुट जाएं यही समय की मांग है अन्यथा आने वाली सन्ततियां हमें कभी क्षमा नहीं कर पाएंगी...
Sunday, March 3, 2013
अहिंसा
अहिंसा परमो धर्मः.
अहिंसा को परम धर्म माना गया है.
हिंदू शास्त्रों में अहिंसा का सूक्ष्म रूप से सुन्दर विश्लेषण किया गया है. यदि किसी के पास पहनने को वस्त्र नहीं हैं तो उसके समक्ष सुन्दर वस्त्रों का प्रदर्शन भी हिंसा है. किसी के पास भोजन नहीं है तो उसके समक्ष रुचिकर भोजन करना भी हिंसा है. कोई अच्छा वक्ता नहीं है तो उसके सामने अपनी वक्तृता का प्रदर्शन करना भी हिंसा है.
इस सम्बन्ध में पुराणों में एक दृष्टांत है. शास्त्रार्थ में एक युवा विद्वान अन्य प्रकांड विद्वान से पराजित हो गए. इस ग्लानी के वशीभूत युवा विद्वान ने जीवन समाप्त करने का निर्णय ले लिया. विजेता विद्वान तक यह समाचार पहुंचा. इस पर युवा विद्वान को बुलवाया गया. विजेता विद्वान ने कहा " मैं विजेता हूँ अतः आपको मेरी आज्ञा का पालन करना होगा". पराजित विद्वान के स्वीकृती देने पर विजेता विद्वान ने कहा "मेरा आदेश है कि आप अपना जीवन समाप्त करने का निर्णय त्याग दें". पराजित विद्वान ने आज्ञा का पालन करते हुए जीवन समाप्त करने का विचार त्याग दिया. इसके तत्काल पश्चात विजेता विद्वान ने अपनी जिव्हा में छिद्र करवाके उसमें काष्ठ का टुकड़ा दाल दिया. जिस जिव्हा के उच्चारण से किसी के जीवन पर बन आए ऐसी जिव्हा का मौन रहना ही श्रेयष्कर है.केवल इश्वर भजन के समय काष्ठ निकाल लेते और पुनः जिव्हा में डाल लेते. उनका नाम ही काष्ठ जिव्हा पाणी पड़ गया.
गृहस्थ
हमारे शास्त्रों में चार आश्रमों में से गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है.
गृहस्थ एक संस्था है जो हमें मर्यादित रूप से मानव जाति के विकास की ओर ले जाती है.
गृहस्थ एक संस्था है जो हमें मर्यादित रूप से मानव जाति के विकास की ओर ले जाती है.
मानव जाति के उत्तरोत्तर विस्तार के लिए आवश्यक है नित्य नवीन अभ्युदय. परन्तु अभ्युदय का मूल्य है उत्सर्ग. तत्सम्बन्धी सभी क्रीड़ाएँ अंततः हमें उत्सर्ग की ओर ही ले जाती हैं.
अभ्युदय - विकास - उत्सर्ग - अभ्युदय, यही चक्र है. प्रकृति ने विभिन्न क्रीड़ाओं में आनंद का समावेश इसीलिए किया है कि मानव जाति का अस्तित्व बचा रहे. प्रकृति की इस व्यवस्था के बिना उत्सर्ग की ओर अग्रसर होना संभव ही नहीं होता.
उत्सर्ग से बचा नहीं जा सकता. हाँ, उसकी अवधि में विस्तार अवश्य किया जा सकता है. कुछ मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध उत्सर्ग की अवधि में विस्तार के वशीभूत ग्राहस्थ्य को ग्रहण नहीं करते.
इससे अभ्युदय का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है.
Saturday, November 10, 2012
जीवन शुद्धि
मानव जीवन में शुद्धता लाने के लिए आवश्यक तत्वों पर चर्चा करें-
विचार शुद्ध हों
आहार शुद्ध हो
उच्चार शुद्ध हो
व्यवहार शुद्ध हो
विहार शुद्ध हो
उपरोक्त साधन साध लेने पर मानव जीवन में निर्मल आनंद का निर्झर बहने लगेगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है.
विचार शुद्ध हों
आहार शुद्ध हो
उच्चार शुद्ध हो
व्यवहार शुद्ध हो
विहार शुद्ध हो
उपरोक्त साधन साध लेने पर मानव जीवन में निर्मल आनंद का निर्झर बहने लगेगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है.
Monday, October 29, 2012
करुणा
धर्म का एक और रूप है करुणा. करुणा भाव से अनेकों सामाजिक समस्याओं का कुशल समाधान किया जा सकता है. विशेषतः महिलाओं के विरुद्ध जो कदाचार की घटनाएँ बढ़ रही हैं उन पर अंकुश लग सकता है. करुणा का भाव हमें किसी अन्य के प्रति हिंसा करने से हतोत्साहित करने की भूमिका का पूर्ण दक्षता से निर्वाह करता है.
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