Sunday, September 30, 2012

धर्म

ईश्वर की वर्तमान अवधारणा का दोष यह है कि हम अपने किये बुरे कार्यों के लिए उसे उत्तरदायी ठहरा देते हैं। ईश्वर ही हमसे करवा रहा है का भाव हमें अपने कृत्य के दायित्व से बचने का मार्ग दिखा देता है।
दूसरा दोष हमें पुरुषार्थ से विमुख करना है। "होई है वही जो राम रची राखा" से प्रेरित हो हम सोचने लगते हैं क्यों इतना श्रम करें।
प्रश्न उठता है फिर विकल्प क्या है?
आइये विचार करें। मानव ही सर्वोपरी है। हम ही हमारे किये कार्यों के प्रति पूर्णत: उत्तरदायी हैं तथा अभीष्ट प्राप्ति के लिए हमें ही पर्याप्त पुरुषार्थ करना होगा।
फिर धर्म क्या है? धर्म एक आचार संहिता है जो मानव जीवन को सम्यक रूप से व्यतीत और सार्थक करने का मार्ग दिखाती है। धर्म के बहुत से अंग हैं जो हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं। इनमें मुख्य हैं - सत्य, अहिंसा, करुणा,

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