Saturday, November 10, 2012

जीवन शुद्धि

मानव जीवन में शुद्धता लाने के लिए आवश्यक तत्वों पर चर्चा करें-



विचार शुद्ध हों

आहार शुद्ध हो

उच्चार शुद्ध हो

व्यवहार शुद्ध हो

विहार शुद्ध हो


उपरोक्त साधन साध लेने पर मानव जीवन में निर्मल आनंद का निर्झर बहने लगेगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है.

Monday, October 29, 2012

करुणा

धर्म का एक और रूप है करुणा. करुणा भाव से अनेकों सामाजिक समस्याओं का कुशल समाधान किया जा सकता है. विशेषतः महिलाओं के विरुद्ध जो कदाचार की घटनाएँ बढ़ रही हैं उन पर अंकुश लग सकता है. करुणा का भाव हमें किसी अन्य के प्रति हिंसा करने से हतोत्साहित करने की भूमिका का पूर्ण दक्षता से निर्वाह करता है.

Saturday, October 6, 2012

सत्य

धर्म को रेल के सिग्नल की तरह समझा जा सकता है। रेल का सिग्नल जिस प्रकार रेलों के कुशल सञ्चालन के लिए आवश्यक होता है,उसी प्रकार धर्म मानव जीवन के सम्यक निर्वाह तथा सार्थकता के लिए अनिवार्य है।
सत्य धर्म का  सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्वरुप है। इसे व्यापक अर्थ में समझाना होगा। सत्य का अर्थ हम सामान्यतः सत्य बोलना ही लगा लेते हैं। वस्तुतः अग्नि के संपर्क में आने पर जलना सत्य का पालन ही है।
इस सम्बन्ध में राष्ट्रिय संत श्री मोरारी बापू का एक दृष्टान्त यहाँ उद्धृत करना उचित होगा। एक व्यक्ति ने विचार किया कई प्रकार के पाक का रसास्वादन कर लिया, अब चन्द्र - पाक बनाते हैं। चन्द्र पाक बनाने के उद्धेश्य से पात्र में घी डाल कर अग्नि पर इस प्रकार रख दिया की पूर्णिमा के चन्द्र की छवि उसमें दिखाई देती रहे। सोचिये, कितना भी समय पकाते रहें तो भी क्या इस प्रकार चन्द्र पाक बन पायेगा? इसी प्रकार सत्य के आश्रय के बिना मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध   नहीं हो सकती।

Thursday, October 4, 2012

स्फुट विचार

स्तरहीन निर्माण देश द्रोह के समान है।

अपशब्दों का  प्रयोग, कार्य विशेष के लिए अनुचित दबाव डालना, धमकी देना आदि भी एक प्रकार का आतंकवाद ही है।  यह तो हम सभी जानते ही हैं की सभी प्रकार के आतंकवाद सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज के सबसे बड़े शत्रु हैं।

Sunday, September 30, 2012

धर्म

ईश्वर की वर्तमान अवधारणा का दोष यह है कि हम अपने किये बुरे कार्यों के लिए उसे उत्तरदायी ठहरा देते हैं। ईश्वर ही हमसे करवा रहा है का भाव हमें अपने कृत्य के दायित्व से बचने का मार्ग दिखा देता है।
दूसरा दोष हमें पुरुषार्थ से विमुख करना है। "होई है वही जो राम रची राखा" से प्रेरित हो हम सोचने लगते हैं क्यों इतना श्रम करें।
प्रश्न उठता है फिर विकल्प क्या है?
आइये विचार करें। मानव ही सर्वोपरी है। हम ही हमारे किये कार्यों के प्रति पूर्णत: उत्तरदायी हैं तथा अभीष्ट प्राप्ति के लिए हमें ही पर्याप्त पुरुषार्थ करना होगा।
फिर धर्म क्या है? धर्म एक आचार संहिता है जो मानव जीवन को सम्यक रूप से व्यतीत और सार्थक करने का मार्ग दिखाती है। धर्म के बहुत से अंग हैं जो हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं। इनमें मुख्य हैं - सत्य, अहिंसा, करुणा,

Saturday, September 29, 2012

मनुष्यत्व

ईश्वर की वर्तमान अवधारणा पर विचार करने पर पाता हूँ कि यह बहुत भ्रामक है। इस अवधारणा के अनुसार ईश्वर अपने भक्त की पुकार पर सहायता को सदैव तत्पर रहता है। इसके विपरीत सत्य यह है कि परम शक्ति या कहें प्रकृति अपने स्थापित नियमों से ही चलती है तथा भक्ति अथवा भजन जैसे किसी कारण से उनमें परिवर्तन को तैयार नहीं होती।
मान्यता यह है कि इश्वर ने मनुष्य को बनाया। यदि गहराई से विचार करें तो समझ में आयेगा कि तथाकथित इश्वर को मनुष्य ने बनाया है। मनुष्य ने अपने दुर्बल क्षणों में संबल के लिए इश्वर की अवधारणा को जन्म दिया।